Thursday, 15 February 2018

सोलह श्रृंगार.....

Posted by मंगलज्योति at February 15, 2018 0 Comments

सोलह श्रृंगार
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सोलह श्रृंगार
श्रृंगार बिना भी सजी हुई थी
अपने बाबा की फुलवारी में,
सदा महका करती थी 
अम्मा की स्नेह पिटारी में,

बाबुल के सपनों की परी
खुशियों के रंगों से सजी
चढ़ी रिवाजों की बलि
जीवन में मची खलबली,

छोड़ आईं घर संसार
जीवन में बन आई बहार,
कर लिया सोलह श्रृंगार
हर कुछ सहने को तैयार,

टूटा फिर भी मन का तार
भीगी पलकें मन पर भार
मिलता नहीं जीवन आधार
माने नहीं फिर भी हार।
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मुक्ता गौतम-
राजनांदगांव,

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