Sunday, 28 January 2018

मुन्नीबाई हाज़िर हो.....

Posted by मंगलज्योति at January 28, 2018 0 Comments

#मुन्नीबाई_हाज़िर_हो...
बा अदब बा मुलाहिज़ा
होशियार....मुन्नीबाई को अदालत में हाज़िर किया जाय
मुन्नीबाई को कटघरे में पेश किया गया....
जज साब ने कहा-शर्मा जी बताइये मुन्नी बाई को किस जुर्म में लाया गया है...मि लार्ड मुन्नी बाई एक वो अपराधी हे जो समाज को एक हाशिये में ढकेल रही यानि मुन्नी बाई पे आरोप है,कि वो कोठा चलाती है....वेश्यावृत्ति करती है......
क्यों मुन्नीबाई क्या कहना है तुम्हारा.....?
मुन्नीबाई ने जोर से हंसते हुए कहा हा हा हा जुर्म और अपराध हा हा हा....
जज महोदय ने कहा आर्डर आर्डर आर्डर मुन्नी बाई शांत ये अदालत है,कोई तुम्हारा कोठा नही जो....
मुन्नी बाई ने कहा माफ़ कीजिये जज साहब मुझे पता है...ये आपका न्याय का मंदिर है,मै सभी लोगो की तरह सम्मान करती हूं,इस मंदिर के चौखट पे सर झुकाती हु,साहेब सर झुकाती हु...
माना मेरे झोपड़े जिसे कोठा कह रहे आप सब कोई इज्जति नही करता,कोई सर नही झुकाता साहेब पर मेरी चौखट से कोई दुखी और रोता हुआ नही जाता हर कोई खुश होकर ही निकलता है...
वकील साब ने कहा क्या बकते हो मुन्नीबाई ये अदालत है.....
हा वकील साब ये अदालत हे..

मालूम है....और जज साब जुर्म और अपराध की बात कर रहे न....हा सबसे बड़ा अपराध कि मै वो औरत हु जो सदियों से शोषण का शिकार होती आई हूं,और एक वस्तु,बतौर समान उपयोगिता की चीज़ बन कर इस दुनिया का अंग बना दी गई...
साहेब अपराधी तो कोई और हे और मुन्नी तो सिर्फ बदनाम होती है बदनाम..सबसे पहला अपराध तो वो मेरे पति ने किया साहेब जो नशे में रह जुए में हार गया मुझे और परोस दिया मुझे अपने दोस्तों को उन कमीनो के पास😢
आज ये दिन नही देखना पड़ता साहेब,यदि मेरे नसीब में भी कोई कृष्ण भगवान होता तो...
फुट फुट कर रोती जा रही थी मुन्नीबाई😢😢😢
और सुनिए साब, धक्के मार कर निकाली गई घर से,एक सज्जन इंसानकी मदद से चाय ठेला चलाती थी साब,पर उसे भी सड़को से हटा तोड़ दिया साब तोड़ दिया...बहुत मिन्नतें मांगी बहुत बड़े बड़े नेताओं के पास गई,बस उन्होंने भी वो फ़ीस मांगी सहायता के लिए जो मेरे तन से गुजरती थी तन से...
अपराधी तो वे हे साब वो सब,मेरा जुर्म यही की में बेबस हो चली थी,और...फिर एक हिस्सा बन गया मेरे जीवन का,मेरे पेट भरने का
साहेब बहुत दुःख होता है साब,दिल में दर्द होता है जब किसी अजनबी के सामने कपड़े खुलते हे साब.....चंद रुपयों के खातिर टूटना पड़ता है......
साहेब 102 डिग्री बुखार में तप रही न...वरना थाने में ही अपने आप को परोस देती तो अदालत की नौबत न आती साहेब.....
और अपराध व जुर्म की बात कर रहे न...भरा पड़ा है अपराधियो से.....
हर जगह वही खेल साब..
बस नाम अलग...अलग
मेरी झोपडी क़ो कोठा
बड़े लोगो के घर को बंगला
और संतो की कुटिया को आश्रम कहते है साब आश्रम
बस जज साब जज....
निर्णय आपके हाथ आपके हाथ.......😢😢😢😢
मुन्नीबाई फुट फुट कर रोते
कठघरे में गिर गई
और वकील बन्धु एक दूसरे को देखने लगे....
जज साब सोच में पड़ गये क्या निर्णय दे....किसे अपराधी घोषित करे
"अदालत में एक सन्नाटा सा छा गया,मुन्नीबाई के कथन और रुदन से"

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Shatrunjay TiwAri
Durg,Bhilai

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