Sunday, 28 January 2018

**अपनों का खून***आपबीती-41

Posted by मंगलज्योति at January 28, 2018 0 Comments

आजकल बहुतेरी घटनायें घटित हो रही हैं जिसमे अपनों द्वारा ही अपनों का खून हो रहा है।बेटा बाप का खून कर दे रहा है।बाप बेटे का खून कर दे रहा है।पत्नी अपने पति का ही खून कर दे रही है या सुपारी देकर अपने पति परमेश्वर का ही खून करवा दे रही है।उस पति परमेश्वर का खून जिसके साथ फेरे लेते समय सात जन्मों तक साथ निभाने की कसम खायी थी।जरा-जरा सी बात पर कत्ल व खून खराबा हो जा रहा है।
इसके पीछे वैसे तो कई कारण हैं लेकिन एक मुख्य कारण है आजकल का खान पान।कहा गया है कि "जैसा खाये अन्न वैसा होय मन"। खानपान का मन पर बडा असर पडता है।इसीलिये सादा और सात्विक भोजन करने की जरूरत होती है।इसीलिये साधुओं और सन्यासियों को तामसिक भोजन करने का निषेध है और वे ऐसा ही करते हैं।अगर कोई किसी का कत्ल करने जाता है तो वह बिना मदिरा-मांस लिये बिना ऐसा नहीँ कर सकता।
लेकिन आज मैं जिस घटना का वर्णन करने जा रहा हूं उसका विवरण पढकर आपके रोंगटे खडे हो जायेंगे।ऐसी घटना आपने कभी न तो सुनी होगी और न भविष्य मे सुनने को ही मिले।
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अकबर बादशाह के दरबार में एक दिन नवरत्नों मे से किसी ने सवाल उठाया कि किसी इंसान के लिये सबसे प्यारी चीज क्या होती है? किसी ने जवाब दिया कि पुत्र सबसे प्यारा होता है तो किसी ने जवाब दिया कि पत्नी सबसे प्यारी होती है।जब वादविवाद के बाद भी कोई निष्कर्ष न निकला तो बीरबल ने एक ड्रम मंगवाया।एक बंदरिया और उसके बच्चे को लाया गया।उस ड्रम के अंदर दोनों को डाल दिया गया और ड्रम को धोरे-धीरे पानी से भरा जाने लगा।थोडा पानी भरने पर जब बच्चे के डूबने की नौबत आई तो बंदरिया ने बच्चे को अपने कंधे पर बिठा लिया जिससे कि वह डूब न सके।जब और पानी बढने पर अपनी जान के लिये भी संकट की स्थिति आई तो बंदरिया ने अपने बच्चे को डूबने के लिये छोड दिया।तुरंत ड्रम खाली किया गया तो बच्चे की जान बची।सिद्ध हो गया था कि अपनी जान ही सर्वोपरि है।मै अब असली घटनाओं के पास ले चलता हूँ।यह घटना एक गोरखा परिवार से संबंधित है जो नेपाल के एक पहाडी पर बसे गांव मे रहता था।मुझे यह घटना मेरे बडे बहनोई श्री भोलाशंकर जी अग्रवाल ने 5-7 साल पहले सुनाई थी।उनको किन्ही अन्य लोगों ने सुनाया होगा।वे बहराइच जिले के रूपईडीहा नामक कस्बे में रहते हैं।रेलवे स्टेशन का नाम नैपालगंज रोड है।यहां से नेपाल बार्डर करीब 2-3 किलोमीटर दूर है।नेपाल के 4-5 किलोमीटर अंदर जाने पर नैपालगंज नामक नगर है।मै वहां भी 4-5 बार जा चुका हूं।अक्सर तांगे से ही गया हूँ।15-20 साल पहले मै आखिरी बार गया था तब मुख्यतः वहां जाने के लिये तांगे और इक्के ही मिलते थे।अब तो सब कुछ बदल गया होगा।नैपालगंज में ही एक सुंदर और रमणीक सरोवर है जिसके अंदर एक मंदिर बना हुआ है जिसमे बागेश्वरी देवी की मूर्ति स्थापित है।यह मूर्ति मेरे समधी स्वर्गीय जयरामदास जी व उनके पुत्रों रामनिवास, रामकुमार व विनोद अग्रवाल व पूरे परिवार द्वारा सन 1989 में समारोहपूर्वक स्थापित की गई।जयरामदास जी बंटवारे के पहले पाकिस्तान के निवासी थे। 1947 के दंगे फसाद में वे सपरिवार भारत आ गये थे।यहां उनको पाकिस्तान की जायदाद के बदले बहराइच के किसी नवाब की कोठी मिली थी। उसे बेचने के बाद वे नैपालगंज में ही बस गये थे।

वहां के लोग उन्हें पाकिस्तानी लाला कहा करते थे।लाला बडा सम्मानजनक शब्द माना जाता है।वैसे लाला के और भी कई अर्थ हैं।बच्चों को प्यार से लाला, लल्ला और लल्लू भी कहा जाता है।जब मै 12-13 बरस का था और मै रूपइडीहा जाता था तो मेरी बहन के श्वसुर स्वर्गीय छंगामलजी ने पहली बार मुझे लाला कह के पुकारा और हमेशा ही मुझे लाला कह के पुकारते रहे।कायस्थ लोगों को भी लाला कहा जाता है।बुंदेलखंड में कुछ जातियों में दामाद को ही लाला कहा जाता है। बनारस में लोग मुझे बालम कहके पुकारते थे।मेरी भोजपुरी कविता "दूना बाबा" मशहूर हुई तो साहित्यिक हलकों मे लोग मुझे दूना बाबा कह के संबोधित करने लगे।दूकान पर बैठता हूं तो लोग सेठजी कहते हैं।
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अब वो घटना सुनिये जिसे पढकर आप सिहर उठेंगे।यह कोई 25-30 साल पहले की बात है।उस साल नेपाल मे भयंकर बाढ आयी थी।बहुत कुछ नष्ट हो गया।चारो ओर तबाही आ गई।फसलें नष्ट हो गईं।बहुत से क्षेत्रों में भूखमरी की नौबत आ गई।बाढ मे डूबने से बहुत से लोग मर-खप गये।वैसे भी नेपाल में बहुत गरीबी है।बहुत से लोग नगरों से काफी दूर-दूर ऊंचे पहाडों पर निवास करते हैं।
वैसे ही एक परिवार मोहन गुरूंग का था।उसके एक पुत्र शंकर था जो 8-9 साल का था।मोहन की पत्नी का नाम मोहनी था।यह एक गोरखा परिवार था।गोरखा लडाई में अपनी बहादुरी के लिये मशहूर हैं।ये भारतीय सेना के अंग है।सेना में इनके नाम से गोरखा रेजिमेंट न जाने कितने दिनों से चला आ रहा है।ये ब्रिटिश सेना के भी अंग हैं।
मोहन गुरूंग सपरिवार किसी भी मैदानी बस्ती से काफी दूर एक पहाड पर बसे गांव में रहता था।बाढ से उसका भी सब कुछ तबाह हो गया।सारी फसल डूब गई।माल असबाब सब कुछ बाढ की भेंट चढ गया।केवल दो-चार रोज खाने भर का सामान ही बच पाया।रूपये और जेवर बच गये थे।उस समय उसके पास रूपये भी काफी थे।लेकिन केवल रूपये से तो पेट नहीँ भरता।आसपास दूर-दूर तक कुछ बचा भी तो न था।आसपास पहले भी न तो दूकानें थीं और न होटल।यहां अपने देश के गावों मे भी तब होटल या दूकानें नहीं होती थीं।
मोहन गुरूंग भी अपनी पत्नी और पुत्र को लेकर भारत में सोनौली बार्डर के लिये चल पडा।पहाडी रास्ते से होकर ही जाना था।रास्ते में खाने पीने का सामान मिलने से रहा।अतः जो भी खाने-पीने का 2-4 किलो अनाज बचा था उसे लेकर वह चल पडा। रूपये जेवर व अपना पारंपरिक हथियार खूखडी भी साथ मे रख लिया था।खूखडी रहने से जंगली जानवरों से भी सुरक्षा होती।डकैतों का भी डर था।बाढ के कारण अराजकता भी फैली हुई थी।
उसके पास खाने पीने का जो सामान था वह 3-4 दिनों मे ही समाप्त हो गया फिर भी चलते ही रहे।मंजिल अभी दूर थी।उनको भारतीय सीमा के निकट भैरहवा पहुंचना था।भैरहवा भारतीय सीमा पर नेपाल का एक विकसित नगर है।वहां पहुंचने के बाद कोई समस्या न होती क्योंकि मोहन के पास पर्याप्त धन था।
खाना खत्म होने के बाद भी वे चलना जारी रक्खे।लेकिन भला बिना खाये वे कब तक चलते।उनकी हिम्मत जवाब देने लगी।शंकर अभी बस आठ साल का ही तो था।सबसे पहले उसकी हालत बिना खाये पिये जवाब देने लगी।वह रह-रह कर खाने के लिये रोने लगता।पानी तो फिर भी मिल जाता पर रास्ते में खाने के लिये कुछ भी नही था।
किसी तरह एक दिन और बीत गया लेकिन शंकर बेहोश हो चुका था।मोहनी की हालत भी खराब होती जा रही थी।
मोहन गुरूंग ने सोचा कि इस प्रकार तो तीनों जने की जान चली जायेगी।अभी भैरहवा जाने में कमसे कम 4-5 दिन तो लग ही जायेगा।मोहनी भी कभी भी बेहोशी में जा सकती थी।शंकर ने मोहनी से कहा "ऐसा लगता है कि हम तीनों का ही जीवन भैरहवा पहुंचने के पहले ही समाप्त हो जायेगा।हममें से एक की जान जाने से दो की जानें बच सकती हैं।"
मोहनी ने कहा " वो कैसे ?"
"वो ऐसे कि दो को बचाने के लिये हम में से किसी एक को मारकर उसके मांस और खून से बाकी बचे दो लोगों का कई दिनों तक जीवन मिल सकता है और फिर वे भैरहवा पहुंच ही जायेंगे।अतः मै सोचता हूँ कि मै इस खूखडी से अपने हाथ की नस काट देता हूं।उससे जो खून निकलेगा उसे तुम पी लेना और खून निकलने से जब मेरी जान निकल जायेगी तब मेरे मांस से अपना और शंकर का पेट भरकर अपना और शंकर की जान बचाना।"
मोहनी बोली "नहीं ऐसा नही हो सकता।तुम मेरी जान लेकर अपना और शंकर का जान बचाओ।मै औरत की जात भला इतना बीहड रास्ता कैसे पार करूंगी।अकेली औरत देखकर नरपशु भी तो नही छोडेंगे।जान और इज्जत दोनों की रक्षा मुश्किल हो जायेगी।तुम ठहरे मर्द की जात।तुम्हारे जिंदा रहने से शंकर तो बच सकता है।"
आपस में विचार-विमर्ष करने के बाद यह तय पाया गया कि शंकर को मारकर अपने लोगों का जीवन बचाया जाय।जिंदा रहेंगे तो और बच्चे पैदा हो जायेंगे।मोहनी कुछ न बोली।शायद मौन स्वीकृती दे दी और मोहन ने अपने कलेजे पर हाथ रख शंकर का काम तमाम कर दिया।दो दिनों तक वे अपने कलेजे के टुकड़े से ही अपनी भूख मिटाते रहे।दो दिनों के बाद फिर भूख जाग्रत हौने लगी।मंजिल अभी भी दूर थी।पास मे रुपया पैसा, सोना चांदी सब कुछ था लेकिन धन से भूख नही मिटती।भूख तो अन्न से या अन्य खाद्य पदार्थों से ही मिटती है।
अब वे फिर भूख से बेहाल हो चले थे।फिर थकान भी हाबी हो चली थी।बच्चे के मार कर खाने का भी गम था।अभी भी मजिल काफी दूर था।रास्ते मे न तो कोई गांव था ना कोई बस्ती।कहीं गांव था भी तो कोई मौजूद न था।फिर अब जान बचाने के लिये भला कया हो सकता है।आखिर मे मोहन गुरूंग एक और खून करने के लिये मजबूर हो गया।वह खून था उसकी अपनी पत्नी मोहिनी का।जिसे वह अपने प्राणों से भी ज्यादा प्यार करता था।मोहिनी का अपने पुत्र के लिये रोना और विलाप करना भी उसे अदर तक झिंझोड़ देता था।उसका खून करने के बाद और उसके मांस से अपनी क्षुधा मिटाकर वह चल पड़ा।दो दिनों बाद वह भैरहवा नगर जा पहुंचा।वहां दूकानों मे खाने-पीने का सामान भरा पड़ा था लेकिन न तो उसका पुत्र जिंदा था और न पत्नी मोहिनी।
वह शहर के बीच पहुंच कर पांच-पांच सौ के नोट पागलों की तरह लुटाने लगा।वह सचमुच पागल हो गया था।
समाप्त
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