Saturday, 19 May 2018

गरीब महिला के गुड्डो का जन्म और ट्रेन का सफर

Posted by मंगलज्योति at May 19, 2018 0 Comments


गरीब महिला के गुड्डो का जन्म और ट्रेन का सफर
   जैसे हीं ट्रेन रवाना होने को हुई।एक औरत और उसका पति एक ट्रंक लिए डिब्बे में घुस पडे़।दरवाजे के पास ही औरत तो बैठ गई पर आदमी चिंतातुर खड़ा था।जानता था कि उसके पास जनरल टिकट है और ये रिज़र्वेशन डिब्बा है।टीटी को टिकट दिखाते उसने हाथ जोड़ दिए।

" ये जनरल टिकट है।अगले स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चले जाना।वरना आठ सौ की रसीद बनेगी।" यह कहकर टीटी आगे चला गया।

पति-पत्नी दोनों बेटी को पहला बेटा होने पर उसे देखने जा रहे थे।सेठ ने बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी और सात सौ रुपये एडवांस दिए थे। बीबी व लोहे की पेटी के साथ जनरल बोगी में बहुत कोशिश की पर घुस नहीं पाए थे। लाचार होकर वे स्लिपर क्लास में आ गए थे। " साहब, बीबी और सामान के साथ जनरल डिब्बे में चढ़ नहीं सकते।हम यहीं कोने में खड़े रहेंगे।बड़ी मेहरबानी होगी।" टीटी की ओर सौ का नोट बढ़ाते हुए उसने कहा।

टीटी गुस्साया" सौ में कुछ नहीं होता।आठ सौ निकालो वरना उतर जाओ।"

बेचारा गरीब पैसिंजर बोला" आठ सौ तो गुड्डो की डिलिवरी में भी नहीं लगे हैं साहब! नाती को देखने जा रहे हैं!गरीब लोग हैं..!जाने दो न साहब!" ..अबकि बार पत्नी ने कहा!

इस पर टीटी बोला:

" तो फिर ऐसा करो, चार सौ निकालो।एक की रसीद बना देता हूँ, दोनों बैठे रहो।"
थोड़ी राहत की सांस लेते हुये गरीब यात्री" ये लो साहब, रसीद रहने दो!दो सौ रुपये बढ़ाते हुए आदमी बोला!
TT:" नहीं-नहीं रसीद दो बनानी हीं पड़ेगी।देश में बुलेट ट्रेन जो आ रही है!एक लाख करोड़ का खर्च है।कहाँ से आयेगा इतना पैसा ? रसीद बना-बनाकर ही तो जमा करना है!ऊपर से आर्डर है।रसीद तो बनेगी ही!
चलो, जल्दी चार सौ निकालो!वरना स्टेशन आ रहा है! उतरकर जनरल बोगी में चले जाओ!" इस बार कुछ डांटते हुए टीटी बोला..!

विवश आदमी ने चार सौ रुपए ऐसे दिए मानों अपना कलेजा निकालकर दे रहा हो! पास हीं खड़े दो यात्री बतिया रहे थे।" ये बुलेट ट्रेन क्या बला है ? "

" बला नहीं जादू है जादू!बिना पासपोर्ट के जापान की सैर! जमीन पर चलने वाला हवाई जहाज है, और इसका किराया भी हबाई सफ़र के बराबर होगा! बिना रिजर्वेशन उसे देख भी लो तो चालान हो जाएगा! एक लाख करोड़ का प्रोजेक्ट है!राजा हरिश्चंद्र को भी ठेका मिले तो बिना एक पैसा खाये खाते में करोड़ों जमा हो जाए..!
सुना है, "अच्छे दिन " इसी ट्रेन में बैठकर आनेवाले हैं!"

उनकी इन बातों पर आसपास के लोग मजा ले रहे थे। मगर वे दोनों पति-पत्नी उदास रुआंसे
ऐसे बैठे थे मानो नाती के पैदा होने पर नहीं उसके सोग में जा रहे हो! कैसे एडजस्ट करेंगे ये चार सौ रुपए? क्या वापसी की टिकट के लिए समधी से पैसे मांगना होगा?

दोनों आपस में मगजमारी में लगे थे।
..नहीं-नहीं। आखिर में पति बोला- " सौ- डेढ़ सौ तो मैं ज्यादा लाया ही था। गुड्डो के घर पैदल ही चलेंगे। शाम को खाना नहीं खायेंगे! दो सौ तो एडजस्ट हो गए और हाँ, आते वक्त पैसिंजर से आयेंगे। इसमें सौ रूपए बचेंगे। एक दिन जरूर ज्यादा लगेगा..! सेठ भी चिल्लायेगा..सह लूंगा मगर मुन्ने के लिए सब सह लूंगा!पत्नी बोलती है मगर फिर भी ये तो तीन सौ ही हुए!"

" ऐसा करते हैं, नाना-नानी की तरफ से जो हम सौ-सौ देनेवाले थे न अब दोनों मिलकर सौ देंगे! हम अलग थोड़े ही हैं। हो गए न चार सौ एडजस्ट!" पत्नी के कहा। " मगर मुन्ने के कम करना....""
इसपर पति की आँख छलक पड़ी!

" मन क्यूँ भारी करते हो जी। गुड्डो जब मुन्ना को लेकर घर आयेंगी; तब दो सौ ज्यादा दे देंगे! "कहते हुए उसकी आँख भी छलक उठी!

फिर आँख पोंछते हुए बोली-" अगर मुझे कहीं मोदीजी मिले तो कहूंगी-" इतने पैसों की बुलेट ट्रेन चलाने के बजाय, इतने पैसों से हर ट्रेन में चार-चार जनरल बोगी लगा दो! जिससे न तो हम जैसों को टिकट होते हुए भी जलील होना पड़े और ना ही हमारे मुन्ने के सौ रुपये कम हो!" उसकी आँख फिर छलके पड़ी थी..!

फिर पति सम्भलता हुआ बोला..

" अरी पगली, हम गरीब आदमी हैं! हमें मोदीजी को वोट देने का तो अधिकार है पर सलाह देने का नहीं! रो मत..!
आपसे यह विनम्र प्राथना है कि इस कहानी या इस घटना से आपका शायद ही इत्तिफ़ाक़ हो पर ये कहानी शेयर /कॉपी/ पेस्ट करें । शायद रेल मंत्रालय जनरल बोगी की भी परिस्थितियों को समझ सके!यह समझ सके कि ट्रेन में सफर करने वाला एक गरीब तबका भी है जिसका चिरकालीन शोषण होता आया है..!

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दीपक कुमार तिवारी 
पत्रकार 

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