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अच्छी भली दुनिया है मेरी उसके बग़ैर

अच्छी भली दुनिया है मेरी उसके बग़ैर 
सोने के पिंजरे में रखूं , बे दाद करूं ,
बोल परिंदे, पर काटूं, आज़ाद करूं !

एक नई तशकील की ख़्वाहिश उभरी है ,
नये सिरे से ख़ुद को फिर ईजाद करूं !!

छोड़े हुए गांव को मुड़ कर क्या देखूं ,
भूले हुए को याद करूं, क्या याद करूं !

मैं ही दूध की नहर निकालूं , चुप तोडूं ,
फूल खिलाऊं , लहजे को फ़रहाद करूं !!

अच्छी भली दुनिया है मेरी उसके बग़ैर ,
बैठे बिठाए क्यूं दुनिया बर्बाद करूं !

मेरी तमन्ना , उसको जी भरकर देखूं ,
उसका हुक्म के मैं भी कुछ इरशाद करूं !!

क्यूं तरजीह न दूं औरों पर ख़ुद को मैं ,
हसबे ज़ुरूरत अपनी ही इमदाद करूं !

वहशते सहरा सांय सांय करती हो ,
शहरे दिल में शहर नया आबाद करूं !!

बोझ बहुत है दिल पर हिज़्र की साअत का ,
किससे दिल का हाल कहूं फ़रयाद करूं !

किस दिल से ये फ़ैसला आख़िर लूं जावेद ,
जिससे ख़ुश हूं , उसको ही नाशाद करूं !!

भावार्थ :- बे दाद-अत्याचार,तशकील -स्वरूप देना,ईजाद-अविष्कार करना , अस्तित्व में लाना,फ़रहाद-जिसने चट्टान काट कर दूध की नहर निकाली ,तमन्ना-इच्छा,इरशाद- कहना,तरजीह-वरियता,हसबे ज़ुरूरत-आवश्यकतानुसार,इमदाद-मदद,वहशते सहरा-रेगिस्तान का भय,हिज़्र की साअत-व्योग के क्षण,नाशाद-दुःख
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          जावेद अकरम
      लखनऊ , उत्तर-प्रदेश 


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