Sunday, 9 December 2018

आशाजनक कैंसर का उपचार

Posted by मंगलज्योति at December 09, 2018 0 Comments

आशाजनक कैंसर का उपचार
कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज के लिए दुनिया भर के शोधकर्ता करीब पचास सालों से टीका विकसित करने का प्रयास करते रहे है। लेकिन वे तमाम प्रयासों के बावजूद ये साबित नही कर पाये की कैंसर का टीका कैसे काम करेगा। लेकिन अब, यूनिवर्सिटी डे मॉन्ट्रियल(University de Montreal) के इंस्टिट्यूट फॉर रिसर्च इन इम्यूनोलॉजी एंड कैंसर(Institute for Research in Immunology and Cancer: IRIC) के शोधकर्ताओं की एक टीम ने यह दिखाया है की एक टीका काम कर सकता है। इतना ही नही यह कैंसर पर बेहद प्रभावी, साइड इफेक्ट रहित और कम लागत वाली कैंसर-विरोधी टीका बन सकता है। शोधकर्ता टीम के इस शोध को कल विज्ञान जर्नल साइंस ट्रांसलेशन मेडिसिन(Science Translational Medicine) में प्रकाशित किया गया है।

यह खोज को कैंसर की टीका की तलाश में एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। यह एक ऐसी शोध है जिसमें दुनिया भर में कई शोध दल व्यस्त है।

साल 2000 से 2005 तक कई शोध अध्ययन ने हमें यह दिखाया है की T प्रतिरक्षा- कोशिकाएं(T lymphocytes) कैंसर पर हमला करने के लिए कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उसे वेध कर नष्ट करने में सक्षम है। प्रमुख शोधकर्ता पियरे थिबॉल्ट(Pierre Thibault), सेबेस्टियन लेमियक्स(Sébastien Lemieux) और क्लॉड पेरेरॉल्ट(Claude Perreault) ने बताया की “लंबे समय तक कैंसर ट्यूमर की उपस्थिति T प्रतिरक्षा- कोशिकाओं को भ्रमित कर देती है जिससे वे कैंसर ट्यूमर की पहचान नही कर पाते है। जिन मरीजों में T प्रतिरक्षा- कोशिकाओं द्वारा सबसे ज्यादा कैंसर ट्यूमर पर हमले किये जाते है वे ज्यादा समय तक कैंसर से लड़ सकते है। करीब 12 वर्ष पहले भी एक दवा विकसित की गयी थी जो मानव प्रतिरक्षा प्रणाली को 25 प्रतिशत कैंसर के मामलों से लड़ने में सक्षम बनाती थी।

आधुनिक शोधों से अब हमें यह ज्ञात हो चला है की T प्रतिरक्षा- कोशिकाएं, ट्यूमर कोशिकाओं की सतह पर प्रतिजनों या पेप्टाइड्स(foreign antigens or peptides) की उपस्थिति से ही कैंसर ट्यूमर की पहचान करते है। इस कारण इस टीका भी प्रतिरक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी ढंग से हमला करने की अनुमति देने के लिए ट्यूमर-विशिष्ट एंटीजन की पहचान करने पर ध्यान केंद्रित करता है। चूंकि ये प्रतिजन दोषपूर्ण जीन का ही एक हिस्सा है इसलिए विभिन्न शोध टीमों द्वारा दोषपूर्ण एंटीजन और प्रोटीन को इनकोड करने के लिए ज्ञात डीएनए के हिस्से को ट्रैक किया जा रहा है। डीएनए का यह हिस्सा मानव जीनोम का केवल 2 प्रतिशत होता है शायद इसलिए वे अभी तक सफल नहीं हुए है। डीएनए अनुक्रमों को गैर-कोडिंग(non-coding) कहा जाता है, वास्तव में डीएनए को मिथाइलेशन(methylation of DNA) द्वारा शांत किया जा सकता है लेकिन यह तकनीक जीन अभिव्यक्ति को प्रभावित कर देता है। इस गैर-कोडिंग डीएनए में जिसका अनुमान है कि हमारे कोशिकाओं के डीएनए का 98 प्रतिशत हिस्सा है, हम शोधकर्ताओं का पूरा काम केंद्रित होता है।”

शोधकर्ताओं ने विभिन्न प्रकार के कैंसर कोशिकाओं के साथ चूहों पर कई प्रयोग किये है जिसके कारण अब शोधकर्ता डीएनए के गैर-कोडिंग हिस्से से प्राप्त कई एंटीजनों की पहचान करने में सक्षम है। जिनमें से कई एंटीजन कैंसर कोशिकाओं के लिए विशिष्ट थे और विभिन्न प्रकार के कैंसर के लिए सामान्य थे। इसने टीम को ल्यूकेमिया कोशिकाओं के आधार पर एक कैंसर टीका विकसित करने की इजाजत दी है। चूहों पर किये गए प्रयोग परिणाम अत्यधिक उत्साहजनक है। पेरेरॉल्ट ने अपनी टीम के निष्कर्षों को बेहद आशाजनक बताया है और इंसानों में ल्यूकेमिया और फेफड़ों के कैंसर के इलाज के लिए टीकों के विकास की संभावना को खोलने के रूप में बताया है।

पेरेरॉल्ट ने कहा "हमें कैंसर के हर रूप के लिए टीका को फिर से बनाने का कार्य शुरू नहीं करना पड़ेगा। साथ ही, मनुष्यों के लिए टीका विकसित करने में बाधाओं में से एक यह है की हमारी आनुवंशिक विविधता चूहों की तुलना में काफी अधिक है। फिर भी मेरा मानना ​​है की मनुष्यों के साथ नैदानिक ​​परीक्षण अगले दो से तीन वर्षों में शुरू हो सकते है।”

शोधकर्ता टीम द्वारा पहचाने गए प्रतिजनों को लक्षित करने वाले चिकित्सीय कैंसर टीकों का विकास जीवन को बचाने के लिए एक प्रभावी तरीका होगा साथ ही यह टीका भयानक बीमारी के उपचार को सरल बना सकता है और विशेष रूप से कीमोथेरेपी से होने वाले कई दुष्प्रभावों को सीमित भी कर सकेगा।

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        पल्लवी कुमारी
      बोध गया , इंडिया 

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