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काश्मीर पर क्यों सब चुप हैं?

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काश्मीर पर क्यों सब चुप हैं?
बलिदानी ना दिखते हैं।
विधवाओं के क्रन्दन स्वर को,
मूक बने बस सुनते हैं।

फटी जींस का जेब दिखाते,
जनता को बस ठगते हैं।
सत्ता के भोगी शासक बन,
गद्दारों संग दिखते हैं।

लड़ते मरते वीर जवानों पर,
रपट बेशर्मी करते हैं।
सत्ता की जोड़ी ना बिछुड़े,
ढोंग अनेकों रचते हैं।

कटु निन्दा चिन्ता बस करते,
दोहरा चेहरा रखतें हैं।
अमर शहीदों के शव को भी,
वोट नजर बस लखते हैं।


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कन्धा देने इन वीरों को,
फुर्सत नहीं ये पाते हैं।
अगर कहानी दादरी होती,
आँसू सभी बहाते हैं।

कश्मीर सुलगता सुलगे लेकिन,
निर्पेक्ष सदा दिखलाते हैं।
कश्मीरी विस्थापित क्यों हैं?
केवल चुप रह जाते हैं।

सत्ता पाने के लालच में-
भीरू बने दिखलाते हैं।
तुष्टिकरण की नयी जुगत में,
सेना को मरवाते हैं।

देश से बढ़कर सत्ता प्यारी-
सावधान कर जाते हैं।
स्वाभिमान बिन पाते सबको,
जिसकी सत्ता लाते हैं।।

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राकेश कुमार पाण्डेय
सादात,गाजीपुर

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