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दो लफ्ज़.....

दो लफ्ज़
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एे बेवफा किसमत तेरे नाम दो लफ्ज़

ग़मों की भोर है ये,आँसुओं का रेला है!
भरी सड़क पे भी,दिल बहुत अकेला है!!

कहाँ पर आ कर हमें इश्क़ ने छोड़ा है!
कहाँ की बस्ती है और कहाँ का मेला है!!

शहर में बिकने को हर चीज़ सामने लगी है!
मिले कुछ अपने लिये, ऐसा नहीं ठेला है!!

बता ऐ ज़िन्दगी हमें, और क्या करना है!
तुझे निभाते हुये बहुत हमने झेला है!!

हुये मायूस इस क़दर, कि कुछ भाये न !
समझ के बैठ गये,मुक़द्दरों का खेला है!!
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Karan Bhai
SHAYAR


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