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खुदा से लड़ती है माँ

**खुदा से लड़ती है.........माँ**
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खुदा से लड़ती है...माँ
बेटा कलेक्टर हैं उसकी सारे जहाँ में चलती है,
पर माँ अब भी गाँव में चूल्हे पे मिर्ची तलती है।

पता नही माँ नए घर मे जाती ही नही या बेटे ले नही जाते,
पर जब भी देखो माँ पता नहीं क्यूँ पुराने ही घर मे मिलती है।।

कुछ कुछ तो मैं भी जानता हूँ दुनिया की हकीकत,
पर माँ मेरा मन तो यहीं लगता है ये ही कहते हुए मिलती है।

रोज सुबह उठ कर माँ फिर इंतजार में लग जाती है,
बेटे को बहुत काम होगा ये ही सोच फिर सो जाती है।।

जानती है उसका कोई नही यहाँ हाल पूछने वाला,
फिर भी बेटों की तारीफ करते हुए नही थकती है।

माँ है माँ कैसे किसी को दिल से भुला दे,
माँ हरवक्त हरपल अपनी ममता को परखती है।

खाली झोली है माँ अकेली है लाचार मगर
हर क्षण बच्चों की खुशी के लिए खुदा से लड़ती है।।
खुदा से लड़ती है.........
माँ।।।।

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प्रदीप सुमनाक्षर
दिल्ली , इंडिया 

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