Friday, 13 April 2018

न आंख वापस मिलती न ये दिन देखने पड़ते

Posted by मंगलज्योति at April 13, 2018 0 Comments

◆◆आंखे◆◆हिंदी कहानी-५ प्रयाग विश्वविद्मालय यूनियन पत्रिका "साधना" १९६२ मे प्रकाशित !

मैं एक एक अंधा भिखारी हूं और अपना पेट पालने के लिए इलाहाबाद की गलियों और सड़कों की खाक छानता फिरता हूं ।भीख मांगने का धंधा बुरा तो है लेकिन मैं अपनी आंखों से लाचार हूं नहीं तो दूसरे के आगे हाथ पसारना और दर-दर की ठोकरें खाना भला किसे अच्छा लगेगा? शायद किसी को भी नहीं। मुझे भी अच्छा नहीं लगता।

  हिंदुस्तान में भला भिखारियों की क्या कमी ।हर गांव और शहर में भिखारी मिलेंगे ।सड़क पर भिखारी मिलेंगे, गली में भिखारी मिलेंगे और और ट्रेन में भी भिखारी मिलेंगे। मंदिर मस्जिद और गिरजाघर के आगे भी भिखारी मिलेंगे। हिंदू, मुसलमान और इसाई भिखारी मिलेंगे ही पंजाबी, बंगाली, मद्रासी, गुजराती और सभी जातियों एवं अन्य प्रांतों के भिखारी भी मिलेंगे। मर्द भिखारी मिलेंगे तो औरतें भी भिखारी मिलेंगी। और भी न जाने कितने वर्गीकरण किए जा सकते हैं। मैं अंधों के वर्ग में आने वाला भिखारी हूं।
.

     आखिर हिंदुस्तान में ही भिखारियों की संख्या इतनी ज्यादा क्यों है? जवाब आसान है। यहां के लोग अधिक धर्म भीरु और अंधविश्वासी हैं। दान-पुण्य में बड़ी आस्था रखते हैं। फिर अगर दान देने वालों की कमी नहीं तो लेने वालों की क्या कमी रहेगी? अंधे लंगड़े ही क्यों हट्टे-कट्टे और तंदुरुस्त भिखारी भी मिलेंगे। यही भिखारी साधू और सन्यासियों का भी ढोंग रचाते हैं। लगता है जैसे साधु सन्यासियों का ढोंग रचाकर इन्होंने समाज पर कोई बहुत बड़ा एहसान किया हो। कुछ अंधे और लंगड़े का ढोंग रचाते हैं और भीख मांगने की नई-नई तरकीबें सोचते रहते हैं। लेकिन इससे नुकसान हम जैसे भिखारियों का होता है जो की भीख मांगने के लिए मजबूर हैं। इन्हीं ढोंगियों के कारण हम जैसे भिखारियों को भी लोगों के व्यंग बाणों का शिकार होना पड़ता है और गालियां सुननी पड़ती है। बहुत से लोग मुझे भी ढोंगी समझ बैठते हैं। अभी कल ही की बात है जब मैं पार्क रोड से घर की ओर लौट रहा था। मैंने दो आदमियों के बीच कुछ इसी तरह की बातचीत होते सुना। इनमें से एक अपने दूसरे साथी से कह रहा था "वह देखो वह भिखारी अंधे का कितना बढ़िया ढोंग रचाये हुए है।" इन्हीं भिखारियों के कारण ही आज हिंदुस्तान गर्त में जा रहा है।" यह सुनकर मुझे कितनी तकलीफ हुई यह मेरा दिल ही जानता है।
लेकिन मैं ना तो जन्म से ही अंधा हूं और न तो जन्म से ही भिखारी। अंधा होने के बाद ही मैं भिखारी हुआ क्योंकि लाचारी जो थी। मैं यही पुराने कटरे में पैदा हुआ। आज जिस मकान में मै रह रहा हूं वह मेरे पिताजी का बनवाया हुआ है।मकान क्या है? एक कोठरी और दालान है। दीवारें मिट्टी की है और छत खपरैल की ।बरसात में मकान चूता भी है।
     मेरे पिता जो मेहनत मजदूरी करते थे।चार बरस की उम्र में ही वह मुझे और मेरी मां को असहाय छोड़ कर इस दुनिया से दूर चले गए। मां बर्तन मांज कर और मेहनत मजदूरी करके मेरा पेट पालने लगी। छ-सात बरस का होने पर मैं स्कूल जाने लगा।फीस मेरी लगती न थी और पुस्तकें वगैरह मेरी मां कहीं से मांग कर ला देती थी दर्जा आठ पास करके मैंने पढ़ाई छोड़ दी और मैं भी मेहनत मजदूरी करने लगा। मैं अब अठारह बरस का हो गया था और मां पचास की उम्र पार कर चुकी थी।
मुझे कमाते देखकर मां ने मेरी शादी कर दी। पिताजी के मरने के बाद संभवतः वह मेरी शादी देखने के लिए ही रुकी हुई थी और मेरी शादी होने के बाद मुझे अपने पैरों पर खड़ा देख मुझसे ही क्या सारी दुनिया से ही मुंह मोड़ लिया।
   मैं एक बार रो उठा, कराह उठा। मां के मरने का दुख सबको होता है। मुझे भी बहुत दुख हुआ। मां की ममता कितनी गहरी और मां का आसरा कितना बड़ा होता है उसे वही अच्छी तरह अनुभव कर सकता है जिसका बाप उसे बचपन में ही बेसहारा छोड़ कर चल बसा हो। वैसे मैं अब जवान हो गया हूं। लेकिन इससे क्या? मां की ममता कुछ और ही होती है और अपने जवान बेटे को भी वह एक बच्चे की तरह ही समझती बूझती है।
जमाना अगर दिल में दर्द पैदा करता है तो उसे समय का फासला कम करने लगता है। मेरे भी दिल का दर्द, मां के वियोग का दुख धीरे-धीरे कम होता चला गया। मेरी बीवी सोना भी इस दर्द को कम करने में मेरी सहायक बनी। उसकी उपस्थिति और मोहब्बत, मुझ में नई चेतना भर देती। नाम उसका सोना था ही मैं भी उसे सोने की तरह ही खरा चमकता था ।मेरी शादी के पांच साल होने को आये। सोना के रूप और खरापन में कोई अंतर नहीं आया। इस अरसे में एक बेटा भी मुझे मिला जिसका नाम मैंने रामू रखा। जब वह चार बरस का हुआ मैंने उसे स्कूल भेजना शुरू कर दिया।
   मैं हमेशा सुख-दुख के झूले में झूलता रहा। अभी पिछला घाव पूरी तरह भरा भी न था कि एक दूसरा वज्रपात हुआ। मैं आजकल एक मकान बनने में मजदूर का काम कर रहा था। एक दिन काम करते समय अचानक मेरा पैर छत पर से फिसला और मैं पीठ के बल जमीन पर आ रहा। गिरते ही मैं बेहोश हो गया। मुझे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया और जहां जहां चोट लगी थी, पट्टी बांधी गई। आंखों पर भी पट्टी बांधी गई। जब मुझे होश आया डॉक्टर ने मुझे बतलाया की पट्टी आठवें दिन खोली जाएगी और तभी तुम जा सकोगे। मैं उस आठवें दिन का इंतजार करने लगा।
   सोना रामू को साथ लेकर रोजाना अस्पताल आती।साथ में खाना बनाकर भी लाती। जहां मैं काम करता था वहां अब सोना काम करती, नहीं तो गुजारा कैसे होता? अब तक मैं मुश्किल से मै पांच-सात रुपया ही बचा पाया था। सोना को मजदूरी भी कम मिलती क्योंकि वह औरत जो थी और औरतों को मर्दों से कम मजदूरी मिलती ही है। आठ दिन किसी तरह बीत गये। केवल आंखों की पट्टी खुलनी ही बाकी थी जो अब खोली जा रही थी। आंखों की पट्टी खुलते ही मैं घबरा गया।
    मेरी आंखों के आगे अभी भी अंधेरा था। मैंने डॉक्टर से कहा-" मुझे दिखाई नहीं देता। बात क्या है?" डॉ भला क्या जवाब देता। मैं अपनी आंखें जो खो बैठा था। सोना रोने लगी। रामू रोने लगा। फिर मेरी आंखें भला क्यों नहीं छलकती। असली पीड़ा तो मुझे ही सहनी थी। हमें रोते देखकर डॉक्टर ने डांटा-"यह महज अस्पताल है। रोने धोने की जगह नहीं। दूसरे मरीजों को इससे तकलीफ पहुंचती है।"डॉक्टर का कहना ठीक ही तो था। हमारे कारण दूसरे रोगियों को भला क्यों तकलीफ उठानी पड़े। मुझे वह क्षण याद आया जब एक बच्चा अस्पताल में रो रहा था और मैं लेटे-लेटे बच्चे का रूदन सुनकर झुंझला रहा था।फिर तीन व्यक्तियों का सम्मिलित रुदन। मेरे दिल के कोने में बैठे इंसानियत ने जोर मारा। मैं चुप हो गया। रामू और सोना को चुप कराया, उठ खड़ा हुआ और टटोल कर सोना का हाथ पकड़ते हुए कहा -"सोना चलो घर चलें" और हम सब चल पड़े। सोना मेरा हाथ पकड़कर मुझे रास्ता दिखाती रही।
     सोना के साथ मैं घर पहुंच गया। मैंने सोना से कहा -"जरा मेरी लाठी तो देना कोने में खड़ी होगी।" लाठी हाथ में ले मैंने मन में विचार किया यह वही लाठी है जो कभी मेरे शान को बढ़ाती थी लेकिन अब मुझे सहारा देने का काम करेगी। पहले लाठी मेरे इशारों पर चलती थी और अब मुझे उसके इशारों पर चलना था।
आंख न होने पर भी मैं अपना भविष्य स्पष्ट देख रहा था। चारों ओर अंधेरा दिखाई देता था। सोचता था बिना आंखों के रोजी कैसे चलेगी? अंधेरे में दिन कैसे बीतेगा? अब तक बचे-खुचे हुए पैसे भी चूक गए थे। आज के खाने भर के लिए आटा और दाल शेष बचा हुआ था। कल क्या होगा? मैं भविष्य की कल्पना करके कांप उठा। सोना भला कहां तक काम करेगी ? एक आदमी की मजदूरी से सबकी रोजी-रोटी भला कैसे चलेगी?फिर सोना के ऊपर मेरा और एक नादान बच्चे का बोझ? भला वह यह सब कुछ कैसे कर सकेगी ?मेरे अंतर मे यह सब प्रश्न चारों तरफ से उमड़ घुमड़ कर पैदा हो रहे था।
    सोना को रोजाना मजदूरी के आठ आने मिलते,लेकिन आठ आने मे भला तीन आदमियों का गुजारा कैसे होता?फिर सुनसान कोठरी मे अंधी आंखों के काले परदों के नीचे समय काटना भी कितना मुश्किल था। एक-एक पल जैसे पहाड़ मालूम होता था। यह कहावत भी ठीक ही है कि "बैठे से बेगार भली।" काम में लगे रहने से समय तो मजे में कट जाता है।फिर एक कामकाजी आदमी को चुपचाप बैठना भला कैसे सुहायेगा? लेकिन मजबूरी सब कराती है। कहां मैं मेहनत मजदूरी करके बीवी बच्चे का पेट पाल रहा था।लेकिन अब? कभी नाव गाड़ी पर तो कभी गाड़ी नाव पर।लेकिन केवल आठ आने में पूरे परिवार का पेट भला कैसे भरता? एक तो चिंता और दूसरे आधे पेट भोजन ने मुझमे परिवर्तन लाना शुरु कर दिया। कपड़े गंदे हो गए और फटने लगे। चेहरे पर दाढ़ी उग आई।इस जीने से तो मर जाना ही बेहतर था ।पास पड़ोस वाले भी व्यंगबाण कसने से बाज नहीं आते। लोग कहते-" देखो तो जरा मुस्टंडे को ।जोरू की कमाई पर पेट पालता है ।"मेरी गर्दन शर्म से नीचे झुक जाती।
एक दिन मैने किसी के मुख से यह कहते हुये सुना-"अन्धा हो गया तो कया? हाथ पैर तो सलामत हैं, फिर भीख कयों नही मांगता? मेरे दिल मे यह बात तीर की तरह चुभ गई।वह ठीक ही तो कह रहा है।मैने निश्चय कर लिया कि आज से ही मैं भी भीख मांगने का धंधा शुरु कर दूंगा।रामू मेरी बगल मे ही बैठा था।सोना काम करने गई हुई थी।मै हाथ मे लाठी ले , खड़ा हो गया और रामू का हाथ पकड़ते हुये बोला-"बेटा, चलो उठो।आज से हम भी भीख मांगना शुरू करेंगे।" और मै घर से निकल पड़ा।जाते समय मैने हरखू की घरवाली से कह दिया कि मै अभी थोड़ी देर मे आ जाऊंगा।सोना मेरी कोई चिंता न करेगी।
. . मै एक अजीब सा अनुभव कर रहा था।शर्म के मारे भीख मांगने की हिम्मत न हो रही थी।कोई परिचित मुझे भीख मांगते देखेगा तो क्या कहेगा भला? एक बार तो जी में आया कि लौट चलूं लेकिन तब तक सोना की मासूम सूरत मेरी आंखो के सामने उभर आई और लोगों के व्यंग बाण मेरे कानों को छलनी करने लगे। मेरे अंतर्मन ने हिम्मत बढ़ाते हुए कहा "तुम्हारी दाढ़ी बढ़ गई है और तुम्हारे चेहरे और शरीर में भी काफी परिवर्तन आ गया है। भला कौन तुम्हें पहचान सकेगा।" मुझ में हिम्मत आई और लज्जा मुझ से कोसों दूर भाग गई। मैंने रामू से कहा-" बेटा आनंद भवन के पास चले चलो, वहीं बैठेंगे तो पर्यटकों से कुछ पैसे मिल ही जाएंगे।" आनंद भवन के आगे मैं एक चादर बिछा कर बैठ गया ।बैठने के बाद मैंने रामू से कहा -"बेटा तुम स्कूल जाओ ।स्कूल से वापस आते हुए मुझे भी साथ ले लेना।" मैं नहीं चाहता था कि मेरे साथ-साथ रामू भी भीख मांगना सीख जाये ।मैं उसे आदमी बनाना चाहता था ।रामू स्कूल से लौट कर आया और मुझे घर वापस लेता गया। इतने समय में मुझे चार आने पैसे मिले थे।सोना ने यह काम करने से मना किया लेकिन मैं न माना।भीख मांगना मेरी दिनचर्या हो गई।आनंद भवन के आगे चादर बिछा कर बैठ जाता और लोगों के आगे गिड़गिड़ाने और हाथ पसारने लगता। लज्जा और झिझक धीरे-धीरे कम होती गई।अब तक मैं इस पेशे के काफी गुणों से परिचित भी हो चुका था। पहले दिन तो चार आने ही मिले थे लेकिन ज्यों-ज्यों दिन बीतते गए और जैसे-जैसे मै इस कला में पारंगत होता गया, पैसे भी ज्यादा मिलने लगे। अभी कल के मिले हुए पैसों को गिना तो पूरे दो रूपये और पैंतीस पैसे निकले। आनंद भवन तक आने के लिए कटरा और कर्नलगंज घूमने के लिए मुझे , अब रामू के सहारे की भी जरूरत न पड़ती थी।रास्ते मे पड़नेवाले हर खंभे, हर मोड़ और हर मकान को मेरे हाथ पैरों ने मिलजुलकर, बखूबी साध लिया था।
   माघ के मेले का अब मुझे इंतजार था और वह नजदीक भी आता जा रहा था। ऐसा सुनने मे आया था कि मेले में सरकार की ओर से नेत्र चिकित्सा शिविर भी खुलने वाला था। यह भी पता चला कि आंख ठीक करने के केवल पचीस रूपये ही लगेंगे लेकिन खाने-पीने का प्रबंध खुद करना होगा। बनारस से कोई आंखों के नामी डॉक्टर आने वाले थे। मैं भी अपनी आंखें दिखाना चाहता था और अब तक मैंने बाइस रूपये के करीब बचा भी लिए थे।मेला शुरू होने तक दस-पंद्रह रूपये और बचा लेने की उम्मीद करता था। माघ का महीना आया और मेला लगने लगा।नेत्र चिकित्सा शिविर भी लगा। मैंने पहले दिन ही जाकर अपनी आंखें दिखाई। डॉक्टर ने बताया कि आंखें ठीक हो जाएंगी और दूसरे दिन ऑपरेशन करने के लिए कहा। मैं मेले से तेज कदमों से चलकर घर पहुंचा और सोना को यह खुशखबरी सुनाई। मैं सुबह होने का इंतजार करने लगा। रात में रह रह कर नींद उचट जाती। सपने आते और ऐसा महसूस होता कि मुझे आंखें वापस मिल गई हो।सुबह नींद खुलते ही सोना ने कहा-" बहुत तेज बारिश आ रही है। मेले तक भला कैसे जाओगे?"
    मैंने निश्चय किया कि कल ही चला जाऊंगा। एक दिन में भला ऐसा कौन सा हर्ज हो जाएगा। लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। उस दिन शाम को ही मुझे बुखार ने धर दबाया। बुखार मियादी था और बुखार से मेरा पिंड ठीक अठारह दिनों बाद छूटा। तब तक मेला उठ चुका था। नेत्र चिकित्सा शिविर भी उठ चुका था और दवा पानी में मेरे पैसे भी उठ चुके थे। फिर वही गली-गली की ठोकरें खाना और लोगों के आगे हाथ पसारना ही भाग्य में लिखा था। लेकिन मैंने भी हिम्मत न हारी क्योंकि मुझे अपने पेशे से सख्त नफरत जो थी। मैंने फिर भीख मांगकर पैसे इकट्ठा करना शुरू कर दिया और आठ-नौ महीने में ही काफी पैसे जमा कर लिए क्योंकि अब मुझे अपने धंधे के सारे गुर मालूम हो चुके थे। जाड़ा शुरू होते ही अपनी आंखें बनवाने के लिए मैंने बनारस जाने का निश्चय कर लिया और एक दिन सोना और रामू को लेकर प्रयाग स्टेशन पर जा पहुंचा और बनारस जाने वाली गाड़ी में जाकर बैठ गया। गाड़ी चल दी।रामू और सोना को एक किनारे बैठा कर मैं गाने लगा-

"भगवान दो घड़ी जरा इंसान बनके देख।
धरती पर चार दिन जरा मेहमान बनके देख।"

  गीत गाने पर कुछ पैसे भी मिले यह गीत मुझे बानो नामक पंजाबी युवती ने मुझे सिखाया था जो स्वंय भीख मांगने का काम किया करती थी।रास्ते भर मै डिब्बा बदल बदल कर भीख मांगता रहा।मै नही चाहता था कि रूपयों की कमी के कारण कोई अड़चन आन पड़े।बनारस आते ही हम उतर पड़े और शहर की ओर चल दिये।सबसे पहले मैने रहने के लिये, पांच रूपये माहवार पर एक कोठरी किराये पर लिया और फिर सोना और रामू को साथ लेकर अस्पताल मे जा पहुंचा।डाकटर ने आंखों को विधिवत देखकर कहा-"घबराने की कोई आवश्यकता नही।आपरेशन कल ही हो जायेगा।कल पूरी तैयारी कर के आना।"
  दूसरे दिन मैं ठीक समय पर अस्पताल पहुंच गया। ऑपरेशन सफलतापूर्वक हो गया और आंखों पर पट्टी बांध दी गई। सोना मेरे लिए रोजाना खाना बना कर लाती।दस दिनों बाद पट्टी खुलने वाली थी। फिर बेचैनी बढ़ने लगी।एक-एक दिन पहाड़ मालूम होने लगा। लेकिन इस बेचैनी में भी एक खुशी की लहर थी, एक भविष्य की आशा छिपी हुई थी। एक-एक करके नौ दिन बीत गए। शाम का समय था। सोना मेरे पास बैठी थी कि एक डॉक्टर ने बताया कि कल सुबह पट्टी खोल दी जाएगी।सोना ने मुझसे कहा-" तबीयत ना लगे तो आज की रात रामू को अपने पास रख लो।" मैंने कहा-" हां यह अच्छा रहेगा। लेकिन अकेले तुम्हे डर तो न लगेगा?"
"डर क्या लगेगा? क्या मै अभी भी कोई बच्ची हूं?" सोना ने हंसकर जवाब दिया। मैं सोना की तरफ से निश्चिंत हो गया ।सोना चली गई और रामू मेरे पास रह गया। तब तक दीवार घड़ी ने सात बजाये।मैं करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगा। लेकिन कोशिश बेकार सिद्ध हुई। करवटें बदलते-बदलते रात के दस बज गए। अस्पताल में शांति छा रही थी लेकिन मेरी बेचैनी बढ़ रही थी। मेरे मन में अचानक यह विचार आया कि नियत समय से कुछ घंटे पहले ही पट्टी खोल देने में भला क्या नुकसान हो सकता है और काफी सोच विचार के बाद मैंने पट्टी खोलना शुरू कर दिया।एक बार पट्टी खोलने पर मैंने अपने आप को अंधा पाया था और आज पट्टी खोलने पर आंखें वापस मिल गई। पहले तो थोड़ा धूंधलका सा दिखाई दिया फिर एक-एक चीजें साफ दिखाई देने लगी।रामू बगल में ही सो रहा था। मैं बड़ा खुश था। सोचा अभी चल कर सोना को हैरत में डाल दूंगा। मैंने रामू को जगाया और खुशी के आवेग में कहा-" रामू मेरी आंखें मुझे वापस मिल गई।चलो घर चलें।"
  रामू मेरी तरफ़ हैरत भरी नजरों से देख रहा था। हो सकता है यह मेरी आंखों का ही भ्रम रहा हो क्योंकि बहुत दिनों बाद मैंने रामू को देखा था। मैंने लाठी उठा लिया। सहारा पाने के लिए नहीं बल्कि सहारा देने के लिए। लाठी को अब मेरे इशारों पर चलना था। बाहर गेट पर चौकीदार स्टूल पर बैठे-बैठे ऊंघ रहा था। मैं उसकी आंख बचाकर, दबे पांव रामू के साथ, अस्पताल के बाहर निकल गया। रामू आगे-आगे चलकर रास्ता बताता गया। मुझे रास्ता भला कैसे मालूम होता? मैं तो केवल एक बार इस रास्ते से सोना के साथ आया था और वह भी तब जब कि मैं अंधा था। रामू ने एक मकान की ओर उंगली से इशारा करते हुए कहा-"वह रहा अपना घर।" घर देखते ही मैं दौड़ पड़ा क्योंकि मैं यह खबर सोना को जल्द से जल्द सुना कर उसे भी अपनी खुशी का भागीदार बनाना चाहता था। दरवाजे के पास आकर मेरे पैर एकाएक ठिठक गये।अंदर से लालटेन की मद्धिम सी रोशनी दरवाजों के पल्लों के बीच के सुराख से छन-छन कर आ रही थी। मैंने मन में विचार किया की जरा देखूँ कि सोना इस समय क्या कर रही है? मैंने अनुमान लगाया था कि वह सो रही होगी। मैंने सुराख में अपनी आंखें जमा दी। अंदर का दृश्य देखते ही मैं सकते में आ गया।सोना कि बगल मे एक नौजवान लेटा हुआ था। तो क्या इसीलिये सोना ने रामू को मेरे पास रक्खा?मै यह दृश्य न देख सका।मैने सुराख से आंखें हटा ली।मै मिलावटी सोना लेकर भला कया करता?रामू मेरे बगल मे ही खड़ा था।मैने रामू से कहा-"चलो बेटा, डाकटर को आंखें वापस कर दें।आंख मिलने से व्यर्थ ही दिल को कष्ट उठाना पड़ा।ये आंख नही थी तभी अच्छा था।।"
रामू ने कहा-"पिताजी यह कया कह रहे हो?आंखें भला कैसे वापस होंगी?"
. तब तक पास के घंटाघर ने बारह बजाये। मैंने रामू से कहा -"अच्छा तो चलो इलाहाबाद ही वापस चलेंगे।"लेकिन वह मेरे साथ चलने को तैयार नहीं हुआ क्योंकि आखिर मे वह एक बच्चा ही तो था और हर बच्चे की तरह अपनी मां से ही ज्यादा प्यार रखता था। वह दरवाजा को खुलवाने चला और मैं स्टेशन की ओर, और साढे बारह बजे जाने वाली गाड़ी में सवार हो गया।
. लोग कहते हैं कि आंख का आना, जाना, उठना और बैठना सब खराब है लेकिन मैं तो कहूंगा कि आंख का रहना ही सबसे खराब है। न आंख वापस मिलती न ये दिन देखने पड़ते।
★★समाप्त★★
*****************








Jagdish Khetan
Kapataganj, India

आप भी अपनी कविता, कहानियां ,लेख अन्य रोचक तथ्य हमसे फेसबुक /ट्विटर ग्रुप में शेयर या
इस Email👉 mangaljyoti05@outlook.com पर भेज सकते हैं !

अपडेट प्राप्त करे

नए लेख के लिए सब्सक्राइब करिये ,हम कभी भी आपका ईमेल पता साझा नहीं करेंगे.

0 comments:

समाज उत्थान हेतु दान पात्र

Subscribe

Archive

Translate

Views

Copyright©2017 All rights reserved मंगलज्योति

back to top