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जब संस्कार हों खतरे में

जब संस्कार हों खतरे में 
सूना सा कोलाहल हो
तब खुद चिल्लाना पड़ता है ,
जब संस्कार हों खतरे में 
तब कलम उठाना पड़ता है 

तुम अपने फूहड़ गीतों से 
मानवता को झुठलाते हो ,
अपनी बोली को बेच बेच 
फिर भी नायक कहलाते हो ।

सुर की देवी को भूल गए 
तब याद दिलाना पड़ता है ,
जब संस्कार हों खतरे में 
तब कलम उठाना पड़ता है ।

निर्लज्ज हुए निर्बाध हुए 
जाने कितने उन्माद हुए,
तेरे गीतों से नव अंकुर
लाखों जीवन बर्बाद हुए 

सात सुरों की थपकी से
तब तुम्हें जगाना पड़ता है ,
जब संस्कार हों खतरे में 
तब कलम उठाना पड़ता है ।

लोक लाज सब ताक रखे
तुम आये दिन बाजार बिके ,
फूहड़ता के बाजारों में 
अपनी भाषा को बेच चुके 

श्लील ,सुगंधित गीतों से 
तब जग महकाना पड़ता है ,
जब संस्कार हों खतरे में 
तब कलम उठाना पड़ता है ।।

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नीरज पाण्डेय , लखनऊ 


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