Friday, 25 January 2019

भारतीय वैज्ञानिक और उनका योगदान

Posted by मंगलज्योति at January 25, 2019 0 Comments

एपीजे अब्दुल कलाम
भारत के पूर्व राष्ट्रपति, जिन्हें दुनिया 'मिसाइलमैन' के नाम से भी जानती है, का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम् (तमिलनाडु) में हुआ था। एपीजे अब्दुल कलाम का पूरा नाम डॉक्टर अबुल पाकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम था। मिसाइल विकसित में उनके अपभूतपूर्व योगदान के कारण उन्हें ‘भारत का मिसाइल मैन' भी कहा जाता है। उन्हें कई पुरस्कारों से नवाजा गया, ‘भारत रत्न' उनमें से एक है।एपीजे अब्दुल कलाम ने भारतीय सेना के लिए मिनी हैलिकॉप्टर तैयार किया। उनके कैरियर ने एक नई करवट ली जब एसएलवी-III प्रोजेक्ट के लिए उनका ट्रांसफर इसरो में हुआ। टीबीआरएल का प्रतिनिधित्व करते हुये, उन्होने स्माइलिंग बुद्धा का प्रतिनिधित्व किया जो कि पहला परमाणु परीक्षण था। 1980 में, उनके व्यापक रिसर्च और विकास कार्यों से उन्हें कई पुरस्कार और प्रशंसाएं प्राप्त हुई। जुलाई 1992 से वे प्रधानमंत्री के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार रहे। पोखरण-II परमाणु परीक्षण के दौरान तकनीक और राजनीति के क्षेत्र में उनकी भूमिका सराहनीय रही।



सी. वी. रमन
हम सब प्राचीन भारत में विज्ञान की उपलब्धियाँ जैसे – शून्य और दशमलव प्रणाली की खोज, पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने, तथा आयुर्वेद के फ़ारमूले इत्यादि के बारे में जानते हैं मगर उस समय पूर्णरूप से प्रयोगात्मक लिहाज़ से कोई विशेष प्रगति नहीं हुई थी। वेंकटरमन का जीवन सादगी और सरलता से भरा था। स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्हें भौतिक शास्त्र के लिए १९३० में गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया।सन 1922 में सी. वी. रमन ने ‘प्रकाश का आणविक विकिरण’ नामक मोनोग्राफ का प्रकाशन कराया। उन्होंने प्रकाश के प्रकीर्णन की जांच के लिए प्रकाश के रंगो में आने वाले परिवर्तनों का निरिक्षण किया।28 फरवरी, सन 1928 को उनका अनुसंधान कार्य पूरा हुआ। उन्होंने उसे ‘रमन प्रभाव’ का नाम दिया। ‘रमन प्रभाव’ की खोज रमन के जीवन की सबसे बड़ी सफलता थी।





होमी जहांगीर भाभा
होमी जहांगीर भाभा भारत के महान परमाणु वैज्ञानिक थे। उन्हे भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। उन्होंने देश के परमाणु कार्यक्रम के भावी स्वरूप की ऐसी मजबूत नींव रखी, जिसके चलते भारत आज विश्व के प्रमुख परमाणु संपन्न देशों की कतार में खड़ा है। उन्होंने नाभिकीय विज्ञान के क्षेत्र में उस समय कार्य आरम्भ किया जब अविछिन्न शृंखला अभिक्रिया का ज्ञान नहीं के बराबर था और नाभिकीय उर्जा से विद्युत उत्पादन की कल्पना को कोई मानने को तैयार नहीं था। उन्होंने कॉस्केट थ्योरी ऑफ इलेक्ट्रान का प्रतिपादन करने साथ ही कॉस्मिक किरणों पर भी काम किया जो पृथ्वी की ओर आते हुए वायुमंडल में प्रवेश करती है। उन्होंने ‘टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च’ (टीआइएफआर) और ‘भाभा एटॉमिक रिसर्च सेण्टर’ के स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वो भारत के ‘एटॉमिक एनर्जी कमीशन’ के पहले अध्यक्ष भी थे।



हरगोविंद खुराना

चिकित्सा में नोबेल पुरस्कार (1968), गैर्डनर फाउंडेशन इंटरनेशनल अवार्ड, लुईसा फाउंडेशन इंटरनेशनल अवार्ड, बेसिक मेडिकल रिसर्च के लिए एल्बर्ट लॉस्कर पुरस्कार, पद्म विभूषण ! डॉ हरगोविंद खुराना एक भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक थे जिन्हें सन 1968 में प्रोटीन संश्लेषण में न्यूक्लिटाइड की भूमिका का प्रदर्शन करने के लिए चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्हें यह पुरस्कार साझा तौर पर दो और अमेरिकी वैज्ञानिकों के साथ दिया गया। सन 1968 में ही डॉ॰ निरेनबर्ग के साथ डॉ खुराना को लूशिया ग्रौट्ज हॉर्विट्ज पुरस्कार भी दिया गया। हरगोविंद खुराना का जन्म ब्रिटिश इंडिया में रायपुर (मुल्तान, अब पाकिस्तान में) में हुआ था पर सन 1966 में उन्होंने अमेरिकी नागरिकता ग्रहण कर ली थी।




जेसी बोस
पेड़−पौधों में जीवन सिद्धांत के प्रतिपादन में महत्वपूर्ण भूमिका, रेडियो और माइक्रोवेव ऑप्टिक्स के क्षेत्र में अग्रणी ! भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर जगदीश चंद्र बोस बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे जिन्होंने रेडियो और माइक्रोवेव ऑप्टिक्स के अविष्कार तथा पेड़−पौधों में जीवन सिद्धांत के प्रतिपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रतिभा का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भौतिक वैज्ञानिक होने के साथ-साथ वो जीव वैज्ञानिक, वनस्पति वैज्ञानिक, पुरातत्वविद और लेखक भी थे।  रेडियो विज्ञान के क्षेत्र में उनके अद्वितीय योगदान और शोध को देखते हुए ‘इंस्टिट्यूट ऑफ इलेक्टि्रकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर’ (आईईईई) ने उन्हें रेडियो विज्ञान के जनकों में से एक माना। हालांकि रेडियो के अविष्कारक का श्रेय इतालवी अविष्कारक मार्कोनी को चला गया परन्तु बहुत से भौतिक शास्त्रियों का कहना है कि प्रोफेसर जगदीश चंद्र बोस ही रेडियो के असली अविष्कारक थे। जेसी बोस के अनुशंधनों और कार्यों का उपयोग आने वाले समय में किया गया। आज का रेडियो, टेलिविजन, भुतलीय संचार रिमोट सेन्सिग, रडार, माइक्रोवेव अवन और इंटरनेट, जगदीश चन्द्र बोस के कृतज्ञ हैं।

सुब्रमन्यन चंद्रशेखर 
‘चंद्रशेखर लिमिट’ की खोज, 1983 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित ! सुब्रमन्यन चंद्रशेखर 20वीं सदी के महानतम वैज्ञानिकों में से एक थे। उन्होंने खगोलशाष्त्र, भौतिकी और एप्लाइड मैथमेटिक्स में सराहनीय कार्य किया। चंद्रशेखर को वर्ष 1983 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। चंद्रशेखर महान भारतीय वैज्ञानिक और भौतिकी के नोबेल पुरस्कार विजेता सीवी रमन के भतीजे थे। चंद्रशेखर मानव की साझी परम्परा में विश्वास रखते थे। उनके अनुसार, “यह एक तथ्य है कि मानव मन एक ही तरीके से काम करता है। इस बात से एक और बात के पता चलता है कि जिन चीजों से हमें आनन्द मिलता है, वे विश्व के हर भाग में लोगों को आनन्द प्रदान करती है। इस प्रकार हम सब का साझा हित है”। चंद्रशेखर एक महान वैज्ञानिक, एक कुशल अध्यापक और उच्चकोटि के विद्वान थे।




डॉ. विक्रम साराभाई 
विक्रम अंबालाल साराभाई भारत के एक महान वैज्ञानिक थे। उन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का पितामह माना जाता है। उनमें वैज्ञानिक, प्रवर्तक, उद्योगपति तथा दिव्यदर्शनद्रष्टा के विरल गुण थे।विक्रम साराभाई मेट्रिक्युलेशन के बाद, कालेज शिक्षण, के लिए केब्रिडज चले गये तथा वर्ष 1940 में सेंट जान कालेज से प्राकृतिक विज्ञान में ट्राइपोस किया। वे 1945 में केब्रिडज वापस गए तथा 1947 में उन्होंने विद्या वाचस्पति (Phd) की शिक्षा पूर्ण की। वर्ष 1957-1958 को अंतर्राष्ट्रीय भू-भौतिकी वर्ष (IGW) के रुप में देखा जाता है। साराभाई द्वारा IGW के लिए भारतीय कार्यक्रम एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा। 1957 में स्पुटनिक-1 के प्रमोचन ने उनको अंतरिक्ष विज्ञान के नये परिदृश्यों से अवगत कराया। तदनंतर, उनकी अध्यक्षता में अंतरिक्ष अनुसंधान हेतु भारतीय राष्ट्रीय समिति (INCOSPAR) का गठन किया गया। डॉ. विक्रम साराभाई ने 1962 में शांति स्वरुप भटनागर पदक प्राप्त किया। राष्ट्र ने वर्ष 1966 में पद्म भूषण तथा वर्ष 1972 में पद्म विभूषण (मृत्योपरांत) से सम्मानित किया।


वेंकटरामन रामकृष्णन
वेंकटरामन रामकृष्णन जीवों के वैज्ञानिक हैं। 2009 में इन्हें रसायन विज्ञान का ‘नोबेल पुरस्कार’ दिया गया था। वेंकटरामन रामकृष्णन को यह पुरस्कार, कोशिका के अंदर प्रोटीन का निर्माण करने वाले ‘राइबोसोम’ की बनावट और उसके काम करने के तरीके के गहरे अध्ययन के लिए दिया गया। साल 1977 में वेंकटरामन रामकृष्णन ने करीब 95 शोधपत्रों का प्रकाशन किया।  वेंकटरामन रामकृष्णन ने साल 2000 में प्रयोगशाला में राइबोसोम की 30 ईकाईयों का पता लगाकर प्रति-जैविकों (Antibiotics) के साथ इनके यौगिकों पर भी अनुसंधान किया।  26 अगस्त 1999 को वेंकटरामन रामकृष्णन ने ‘राइबोसोम’ पर आधारित 3 शोधपत्र प्रकाशित किए। उनका यह शोध कार्य 21 सितबंर 2000 को ‘नेचर’ पत्रिका में छपा था। उनके शोध से ‘राइबोसोम’ की परमाणु संरचना का पता लगता है। वेंकटरामन रामकृष्णन को लोग हिस्टोन और क्रोमैटिन की संरचना कार्य के लिए भी जानते हैं।



जयंत विष्णु नार्लीकर
जयंत विष्णु नार्लीकर का जन्म 19 जुलाई, 1938 को कोल्हापुर, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता विष्णु वासुदेव नार्लीकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में गणित विभाग के अध्यक्ष थे, इसलिए उनकी शिक्षा-दीक्षा भी वहीं से हुई। उन्होंने 1963 में गणित में पी-एच. डी. की डिग्री हासिल की। बाद में खगोल-भौतिकी में उनकी रूचि बढ़ी और उन्होंने उसमें प्रवीणता हासिल की।ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति विशाल विस्फोट (Big Bang) के द्वारा हुई थी। इसके साथ साथ ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में एक और सिद्धान्त प्रतिपादित है, जिसका नाम स्थायी अवस्था सिद्धान्त (Steady State Theory) है। इस सिद्धान्त के जनक फ्रेड हॉयल हैं। अपने इंग्लैंड के प्रवास के दौरान, नार्लीकर ने इस सिद्धान्त पर फ्रेड हॉयल के साथ काम किया। इसके साथ ही उन्होंने आइंस्टीन के आपेक्षिकता सिद्धान्त और माक सिद्धान्त को मिलाते हुए हॉयल-नार्लीकर सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। वह 1963 से 1972 तक किंग्स कॉलेज के फेलो रहे और 1966 से 1972 तक इंस्टीट्यूट ऑफ़ थिओरेटिकल एस्ट्रोनामी के संस्थापक सदस्य के रूप में जुड़े रहे। 1970 के दशक में नार्लीकर भारतवर्ष वापस लौट आये और टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान में कार्य करने लगे। 1988 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के द्वारा उन्हे खगोलशास्त्र एवं खगोलभौतिकी अन्तरविश्वविद्यालय केन्द्र स्थापित करने का कार्य सौंपा गया। उन्होने यहाँ से 2003 में अवकाश ग्रहण कर लिया। अब वे वहीं प्रतिष्ठित अध्यापक हैं।

सत्येन्द्रनाथ बोस
“बोस-आइंस्टीन सिद्धांत’, उनके नाम पर एक उपपरमाण्विक कण बोसॉन को नाम दिया गया, “पद्म भूषण ‘से सम्मानित किया ! सत्येन्द्र नाथ बोस एक उत्कृष्ट भारतीय भौतिक वैज्ञानिक थे। उन्हें क्वांटम फिजिक्स में महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाना जाता है। क्वांटम फिजिक्स में उनके अनुसन्धान ने “बोस-आइंस्टीन स्टेटिस्टिक्स” और “बोस-आइंस्टीन कंडनसेट’ सिद्धांत की आधारशिला रखी। भौतिक शास्त्र में दो प्रकार के अणु माने जाते हैं – बोसॉन और फर्मियान। ‘बोसॉन’ महान भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्रनाथ बोस के नाम को भौतिकी में अमिट रखने के लिया दिया गया है क्योंकि इस महान भारतीय वैज्ञानिक ने आधुनिक भौतिकी यानी क्वांटम भौतिकी को एक नई दिशा दी। उनके कार्यों की सराहना महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने की और उनके साथ मिलकर कई सिद्धांत प्रतिपादित किये। क्वांटम फिजिक्स में उनके अनुसन्धान ने इस विषय को एक नयी दिशा प्रदान की और उनके खोज पर आधारित नयी खोज करने वाले कई वैज्ञानिकों को आगे जाकर नोबेल पुरस्कार मिला।


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           मंगलज्योति


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