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मिली है कुछ लम्हों की मोहलत


मिली है कुछ लम्हों की मोहलत
आज हसीन शाम को दरिया की गीली रेत पर चलते 
ज़िंदगी से नाफ़रमानी करने को जी चाहता है.!
नहीं जीना यूँ खोखली ज़िंदगी मर मरकर 
नहीं जाना आज घर वापस 
भटकूँ पूरे शहर के चप्पे चप्पे को छान लूँ.!
 बस जैसी हूँ वैसी ही निकल पडूँ ,
या पूरा दिन पड़ी रहूँ बिस्तर पर आभासी दोस्तों संग 
बतियाते मोबाइल की बैटरी खत्म होने तक.!
कुछ ख़्वाब बुनूँ ऊँचे खुद को रानी कहलवाऊँ,
बस चलती रहूँ ओर किसी अनजाने यायावर सी 
किसी मोड़ पर खो जाऊँ, 
किताबों में खुद को खोजूँ या लिख दूँ किताब ही खुद पर.!
भीड़ को चिरती निकल जाऊँ हर इंसान को अनदेखा कर दूँ, 
पडोसियों से मुँह मोडूँ ओर अन्जान को गले लगाऊँ.!
पान की दुकान पर जाकर सिगरेट मांगूँ पीऊँ भले नहीं,
दोस्तों के कहे जोक्स पर हंसने की बजाय रोने लगूँ, 
ना कुछ महसूस करुँ ना मुस्कुराऊँ.!
कुंभ के मेले में कहीं खो जाऊँ किसी टोली के साथ चल निकलूँ.!
कानन की वनराई संग गीत जाऊँ
 या सहरा में दूर-दूर दौड़ी जाऊँ,
या हिमालय की गिरी कंदरा में कहीं बस जाऊँ.!
या बार्डर पर सैनिकों को शौर्यगान सुनाऊँ,
शहीदों की विधवाओं को दे दूँ अपनी हिम्मत का हिस्सा, 
या अनाथालय से बच्चे ले जाकर तड़पती बांझ को ममता दे दूँ.! 
जात पात से उपर उठकर एकता की अलख जगा लूँ ,
स्त्री विमर्श की पड़ी रही उस कागज़ी पुकार की मैं धज्जियां उड़ा दूँ.!
मन करता है बलात्कारियों की बोटी नौच लूँ,
दुनिया से सारे गम की एक गठरी बाँधूँ फूँक लगा कर हवाओं में बहा दूँ,
आसमान से उधार मांगूँ खुशियों की सौगात 
एक एक कर बाँटती जाऊँ हर चेहरे पर मुस्कान पाऊँ.!
पा लूँ कहीं से जादू एसा छूमंतर छू बोलकर गरीब के पेट की आग बूझा दूँ.!
मिली है कुछ लम्हों की मोहलत,
मन करता है मरने के बाद भी नाम रहे कुछ एसा कर जाऊँ।।

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     भावना जितेन्द्र ठाकर
       बेंगलुरु-कर्नाटक 

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